पन्ना जिले से 9 साल पहले हुई हत्या में पुलिस की कहानी को हाईकोर्ट ने मनगढंत पाया, दोनों आरोपी बरी हुए
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पन्ना में कथित अवैध संबंधों के चलते हुई एक ह्त्या में मामले में पुलिस की पूरी कार्रवाई को मप्र हाईकोर्ट ने मनगढंत पाया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि जिस समय इंस्पेक्टर डीके सिंह जंगल में थे, उसी समय पर उन्होंने थाने में आरोपियों के मेमो भी तैयार कर लिए। एक आदमी एक ही समय पर दो जगहों पर नहीं रह सकता है। अदालत में पूरे मामले का बारीकी से परीक्षण कर कहा कि किसी बेक़सूर नागरिक को झूठे मामले में फंसाने की इजाजत पुलिस को नहीं दी जा सकती। बेंच ने न सिर्फ दोनों आरोपियों को बरी किया, बल्कि राज्य के डीजीपी को कहा है की यदि इंस्पेक्टर डीके सिंह अभी भी नौकरी में हैं, तो झूठा मामला दर्ज करने पर उनके खिलाफ विभागीय जांच की जाए। हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया कि सिर्फ शक और अधूरी कड़ियों के आधार पर किसी को उम्रकैद नहीं दी जा सकती।
कीटनाशक पिलाकर हत्या करने का था आरोप
इस मामले में पन्ना की कमलेश बाई कुशवाहा पर आरोप था कि उसके राजू कुशवाहा से अवैध सम्बन्ध थे। इसी के चलते कमलेश बाई ने राजू के साथ मिलकर अपने पति पंथप्रकाश को पहले कीटनाशक पिलाकर उसकी हत्या की और फिर उसकी लाश को ले जाकर जंगल में फेंक दिया। पन्ना की प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 16 नवंबर 2022 को कमलेश बाई कुशवाहा और राजू कुशवाहा को धारा 302/34 IPC के तहत आजीवन कारावास और धारा 201 IPC में एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
असफल हुई “लास्ट सीन” थ्योरी
अपने फैसले में डिवीज़न बेंच ने पाया कि मुख्य गवाह रामजान खान पूरी तरह से hostile हो गया। उसने अदालत में साफ कहा कि उसने आरोपियों को मृतक के साथ नहीं देखा था। यानी अभियोजन की “अंतिम बार साथ देखे जाने” की थ्योरी अदालत में टिक नहीं सकी।
पुलिस पर फर्जी दस्तावेज बनाने का संकेत
कोर्ट ने पाया कि वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. महेंद्र सिंह के अनुसार, 5 अप्रैल 2017 को सुबह 8:30 बजे इंस्पेक्टर डी.के. सिंह घटनास्थल पर मौजूद थे। जबकि अभियोजन के अनुसार उसी समय 8:30 और 9:00 बजे थाने में आरोपियों के मेमो दर्ज किए गए। कोर्ट ने कहा कि जब अधिकारी मौके पर थे, तो थाने में मेमो कैसे तैयार हुए? ये दस्तावेज बाद में बनाए गए प्रतीत होते हैं। अदालत ने इसे फर्जी दस्तावेज बनाने की आशंका बताया और DGP को विभागीय जांच पर विचार करने का निर्देश दिया।
कॉल डिटेल्स भी अधूरी
आरोपियों की कॉल रिकॉर्ड के साथ Section 65B के तहत वैध प्रमाणपत्र पेश नहीं किया गया। मोबाइल लोकेशन से आरोपियों की उपस्थिति साबित नहीं हुई। कोर्ट ने इसे भी गंभीर कमी माना।
कीटनाशक थ्योरी भी साबित नहीं
अभियोजन ने दावा किया था कि पानी में कीटनाशक मिलाकर पंथप्रकाश की हत्या की गई। लेकिन पुलिस द्वारा बरामद की गई बोतल के रासायनिक गुण (गंध, रंग, प्रभाव) साबित ही नहीं किए गए। कोई भी ठोस वैज्ञानिक परीक्षण भी रिकॉर्ड पर नहीं था।
मुख्य गवाह के बयान से अभियोजन कमजोर
मृतक के भाई छोटेलाल ने जिरह में स्वीकार किया था कि पुलिस ने उसके हस्ताक्षर खाली कागज पर लिए थे। उसने कभी भी आरोपियों को आपत्तिजनक स्थिति में नहीं देखा। मृतक ने उसे कभी भी अपनी पत्नी के अवैध संबंध की जानकारी नहीं दी।
हाईकोर्ट ने रद्द की सजा
हाईकोर्ट ने कहा “पुलिस को मनमाने तरीके से फर्जी दस्तावेज बनाकर निर्दोष नागरिकों को दोषी ठहराने की छूट नहीं दी जा सकती।” कोर्ट ने आरोपियों को दी गई सजा रद्द करके उनकी तत्काल रिहाई के आदेश भी दिए।